जीवाणु विज्ञान : डॉ. गोविन्द भास्कर घाणेकर द्वारा मुफ्त हिंदी पीडीएफ पुस्तक | Jivanu Vigyan : by Dr. Govind Bhaskar Ghanekar Free Hindi PDF Book

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पुस्तक का नाम / Name of Book : जीवाणु विज्ञान / Jivanu Vigyan


पुस्तक के लेखक / Author of Book : डॉ. गोविन्द भास्कर घाणेकर / Dr. Govind Bhaskar Ghanekar


पुस्तक की भाषा / Language of Book : हिंदी / Hindi


पुस्तक का आकर / Size of Ebook : 3.4 MB


कुल पन्ने / Total pages in ebook : 320


पुस्तक डाउनलोड स्थिति / Ebook Downloading Status  : Best 

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पुस्तक का विवरण : जीवाणु-विज्ञान जीवाणुओं के अध्ययन से संबंधित है, पर प्राय: जीवाणुविज्ञान अणुजीव विज्ञान के पर्यायावाची अर्थ में भी प्रयुक्त होता हैं। मनुष्य के शरीर में जीवाणु की उपस्थिति का पता सर्वप्रथम 1880 ईo में लगा और जीवाणुओं का अध्ययन चिकित्सा-विज्ञान का अंग बना। कुछ ऐसे जीवाणु भी मालूम हैं, जो मनुष्य के शरीर में रहते हुए उसे कोई हानि नहीं पहुंचाते और उपयोगी हैं। सच तो यह है कि मनुष्य का अस्तित्व जीवाणुओं की क्रियाओं पर ही आधारित है। जीवाणुओं के बिना पृथ्वी परजीव जंतु एवं पौधे जीवित नहीं रह सकते, क्योंकि इनका अस्तित्व भूमि के उपजाऊपन पर निर्भर है तथा पृथ्वी का उपजाऊपन पृथ्वी में रहनेवाले इन सूक्ष्म जीवों की क्रियाओं पर निर्भर हैं..............


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Description about eBook : Bacteriology is related to the study of bacteria, but often bacteriology is also used in the sense of the substance of microbiology. The presence of bacteria in the human body was first addressed in 1880 and study of bacteria became part of therapeutics. Some bacteria also know that, while living in the body of the body, it does not cause any harm and is useful. The truth is that human existence is based on the actions of bacteria. Without bacteria, living organisms and plants can not survive, because their existence depends on the fertility of the land and the fertility of the Earth is dependent on the actions of these micro-organisms living on Earth................


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One Quotation / एक उद्धरण

“आलोचना से बचने की एक ही राह है: कुछ न करें, कुछ न कहें, और कुछ न बनें।”
अरस्तु

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“There is only one way to avoid criticism: do nothing, say nothing, and be nothing.” 
Aristotle






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